गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

तुम्हें जब भी भुलाऊँगा  





तुम्हें  जब भी भुलाऊँगा मुझे तुम याद आओगे

तुम्हें चाहा था मैंने इस हुदूदे-जिस्म से बाहर
तुम्हें चाहा था मैंने आस्माँ को बाँहों में भरकर
तुम्हें क्यूँ चाहा था इसका न ख़ुद भी इल्म है मुझको
के चाहत नाम है जिसका है बेचेहरा कोई पैकर
हदें जब तोड़ पाऊँगा   मुझे तुम याद आओगे 
तुम्हें  जब भी भुलाऊँगा मुझे तुम याद आओगे

ख़िज़ाँ की बरहना शाख़ें ,अकेली जागती रातें
हवा की साँय साँय जैसे ख़ुद से करते हों बातें
खंडर में याद के बेचैन सी तनहा चहलक़दमी
तुम्हारी इक ज़रा लग्ज़िश की ये भरपूर सौग़ातें
मैं इनका लुत्फ़ उठाऊँगा मुझे तुम याद आओगे
तुम्हें  जब भी भुलाऊँगा मुझे तुम याद आओगे

ये सच है एक पल सोचा के तुमको भूल जाऊँगा
उजारूँगा शह्र इक,  इक नई  बस्ती  बसाऊँगा
मगर जो चाँदनी रातों में तेरी खुशबुएँ शामिल
भला दिल के हरन को किस क़दर मैं रोक  पाऊँगा
मैं दिल के नाज़ उठाऊँगा  मुझे तुम याद आओगे
तुम्हें  जब भी भुलाऊँगा मुझे तुम याद आओगे


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यूँ ही बेसबब....


ज़रा शह्र की आज
 सड़कों पे घूमा 
न दफ़्तर का चक्कर,
न घर के मसाइल
न सोचा के हैं मुल्क के कैसे रहबर
न देखा उसे रास्ते के किनारे
जिसे कोई भी देखता ही नहीं है
न चाहा के
बाँटूँ मैं ग़म दूसरों का
न कोशिश ये की 
शब की नादानियों में 
जो ख़्वाबों को देखा है
ताबीर कर लूँ
न तरसा के
 जो शायरी अब तलक की
उसे बैठकर चाय की इक दुकाँ पे
 सुनाकर करूँ
ख़ुदसताइश का सामाँ

यूँ ही बेसबब और यूँ ही बेइरादा
ज़रा शह्र की आज सड़कों पे घूमा
मगर आज जब थक के बिस्तर पे लेटा
वो ख़्वाबों का चेहरा बड़ा अजनबी था
कुछ ऐसे सवालात थे सब्त जिसपे
जवाबात जिनके थे सड़कों पे बिखरे

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   ग़ज़ल


सारे  भरम ज़िन्दा उसमें
तुम और हम ज़िन्दा उसमें

वो  साया  हमदोनों  का
सारे क़सम ज़िन्दा उसमें

ख़ुशियाँ फ़ना हुईं  हमसे
रंजो-अलम ज़िन्दा उसमें

याद के पिंजरे में  लम्हे
बिछड़ा ग़म ज़िन्दा उसमें

मौसम  सारे  कुम्हलाए
इक मौसम ज़िन्दा उसमें

ख़ुश न हुए हम इक लम्हा
कौन सा ग़म ज़िन्दा उसमें

काबा-ए-दिल कैसा 'कुन्दन'
सारे  सनम  ज़िन्दा  उसमें

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ग़ज़ल


ग़ौर से पढ़िए तो बस एक ही अफ़साना है  
अपने मफ़हूम से जो लफ़्ज़ है बेगाना है


वैसे जाना तो है एक दिन बहुत ही दूर हमें
पर  ये  मालूम नहीं है   के  कहाँ जाना है


अपनी कोशिश रही कोशिश से नहीं बाज़ आएँ
जो  नहीं  समझेंगे   उनको हमें समझाना है


हम उदासी के भँवर में तो गिरफ़्तार नहीं
हो  किनारा  के  तहे-बह्र   उतर जाना है


कुछ तबीयत न हुई जाएँ दरे-शाह पे  हम
चलिए मंज़ूर है बस सर ही तो कटवाना है


उसने बेचैनी की जागीर जो लिख दी हमको
अब  जहाँ  आएँ  ब-अंदाज़े-जुनूँ  आना  है


एक ख़्वाहिश है के उस गाम पे पहुँचे 'कुन्दन'
कह  सके   लौट के वापस  न  उसे  जाना  है

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       ग़ज़ल


 अजब  एहसास से  आरी  है दुनिया
मगर फिर भी बहुत प्यारी है दुनिया

नहीं छोड़ेगी जब तक सांस बाक़ी
हमारी  जान  पे  भारी  है दुनिया

कभी सिमटे किसी इक शख़्स में  ये
कभी  अफ़लाक  पे  तारी  है दुनिया

सिकंदर  की  कभी  महबूब  है   ये 
कभी  मजनूँ  की बेज़ारी है दुनिया

निकल जाओ सलीक़े से  यहाँ से
इसी नुक़्ते की तैय्यारी है दुनिया

यही सच है तवील इक नींद में है
गुमाँ ये है  के  बेदारी है  दुनिया

तेरी दुनिया की  मजबूरी है  'कुन्दन'
और इस शायर की लाचारी है दुनिया


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                  ग़ज़ल


          मैंने  सोचा  था   मेरे  चाहनेवाले  हैं  बहुत
         ये न समझा के यहाँ शख़्स निराले हैं बहुत

      मुझपे शक कर लो मगर झाँक के दिल में देखो
     मेरी   मासूम  मुहब्बत   के   हवाले   हैं  बहुत

        मैंने माना के मेरी जान अन्धेरा है दबीज़
         सब्र कर इसमें शररबार उजाले हैं बहुत

      एक लम्हे के लिए ख़ुद में ज़रा गुम जो हुआ
     ख़ैरख़्वाहों ने  तो  मफ़हूम निकाले हैं  बहुत

     भूख  पर  उनकी  ही तक़रीर  ज़बर्दस्त  रही
     जिनके ग़ल्ले हैं फ़ुजूँ,जिनके निवाले हैं बहुत

     उस नगर से ही मैं निकला हूँ अभी बाइज़्ज़त
    जिसकी तारीख़  के  दस्तार उछाले हैं  बहुत

   कल थका सा था मिला वो ही तुम्हारा 'कुन्दन'
   ज़िन्दगी ,  जिसने  तेरे  वार  सँभाले  हैं  बहुत


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शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

ग़ज़ल



तुम झूठ जो बोलो तो चलो झूठ ही बोलो
सच से कहो के हाथ मलो , झूठ ही बोलो

घर से तो मियाँ काम से निकलोगे ही बाहर
अब क्या करोगे , सबसे मिलो, झूठ ही बोलो

अब और कितने फ़ाक़े भला सच के लिए हों
बस मक़्र के टुकड़ों पे पलो , झूठ  ही  बोलो

वो क्या सुफ़ैद गाडी पे ज़न्नाटे से निकला
है  दोस्त तुम्हारा वो ? लो, झूठ ही  बोलो

कुछ रस्मो-राह भी तो निभाना ज़रा सीखो
रक्खो न फोन, कह दो हलो, झूठ ही बोलो

महफ़िल में हो तो साहिबे-महफ़िल भी तुम्हीं हो
सबकी न सुनो,  ख़ुद को छलो , झूठ  ही बोलो

कह दो ये सबसे घर पे अहम काम हैं 'कुंदन'
जी भर गया तो उठ के चलो , झूठ ही बोलो

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